Saturday, 8 July 2023

सोने की बिल्ली का डर

 

बचपन से मेरा लगाव दादा जी के साथ सबसे ज्यादा थी या कह ले दादा जी मुझे मेरे दसो  भाई-बहनों में ज्यादा मानते थे, संयुक्त परिवार होने के नाते हम सभी दोतल्ला मकान एक साथ ही रहते थे,नीचे के कमरे किराये पर लगे थे, मेरे पिता जी तीन भाई थे और ऊपरी मंजिल में हम सभी परिवार का अपना कमरा था, लेकिन सबसे बेहतरीन कमरा दादा जी का हुवा करता था जो रौशनी और हवा से हमेशा गुलज़ार रहती थीं, दादा जी का कमरा दक्षिण में खुलने वाली दो बड़ी बड़ी खिड़कियों में हुआ करता था जिससे अविरल खुशप्रद बयार चलती रहती थी, मेरे पढ़ने का कमरा भी वही मुकर्रर कर दिया गया था, सभी भाइयो में सबसे बड़ा होने के नाते मुझसे हर मामले में सभी को उम्मीद ज्यादा होती थी ख़ासकर दादा जी को, मेरा दसवी बोर्ड का पास होना मेरे दादा जी के लिए उनका मेरे ऊपर की गई छोटी छोटी खर्च रूपी इन्वेस्टमेंट का एक बड़ा सा रिटर्न्स था जो उन्होंने मुझ पर और भाई बहनों के मुकाबले कुछ ज्यादा किये थे, वो चाहे रोज सुबह के 5 बजे मिठाई दुकान पर रसगुल्ले और पाव रोटी खिलाने के हो या फ़िर मेरी कोई जरूरत के समान की खरीदारी में हो। दादा जी के समक्ष सचमुच मैं सबसे ज्यादा अमीर और निश्चिन्द होता था। हाँ इसमे पढ़ाई के मामले में कोई ढिलाई नही होनी चाहिए थी, पढ़ाई से जरा भी ग़फ़लत करने की भूल मुझे दादा जी के बग़ल में रखे हुवे बेंत से चुकानी पड़ती थीं, जो साधारण दिनों में एक बड़ी सी आईने के पीछे रखा हुआ रहता था, दादा जी ने मुझे अपने कमरे मे ही अपने सामने पढ़ाने का फैसला किया था। इस मामले में उनका मानना था कि बच्चे बेंत से ही  दुरूस्त, होशियार,और "न पढ़ने का मन" को दुरुस्त और सटीक किया जा सकता है।

रोज की ही तरह एक रोज भोर जब मैं पढ़ाई में व्यस्त था दादा अपने बेड पर खिड़की से चलने वाली हवाओं और रास्ते पर होने वाली गतिविधिया और मोटरगाड़ियों का नज़ारा ले रहे थे, तभी खिड़की के नीचे एक टाली का मकान जो लगभग चार फुट के दूरी पर हुवा करता था,के छत से टपक कर एक सफ़ेद बिल्ली का आगमन हुआ, वो निडर बिल्ली बिना बिचलित हुवे दादा जी के कमरे में प्रवेश कर गई, थोड़ी देर बाद दादा जी ने उस बिल्ली को कुछ टूटे हुए बिस्किट दिए, उसे खाने के बाद वो चली गई, मैं बिल्ली की गतिविधियां देखते हुए  सोच रहा था कि ये बिल्लियां कितनी स्वाभाविक, निडर और आत्म्विश्वासी होती है किसी नए घर में उसका स्वागत डंडे से भी हो सकता था उसकी इसे ज़रा भी ख़याल नही.. ख़ैर अब बिल्ली का रोज सुबह निर्दिष्ट समय पर आना और बिस्किट को खा कर चले जाने का शिलशिला शुरू हो गया, अब वो मेरे पढ़ने की सोफे में भी आ कर बैठने लगी, मैं भी उसे यदा कदा प्यार से हाथ फेर कर अपना प्रेम प्रदर्शित कर देता था, एक दिन जब दादा जी शायद बाथरूम गए हुवे थे तब वो बिल्ली दादा जी को न पाकर मेरे समक्ष बैठ गई,मैंने दादा जी की अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाते हुए अपने उस घर का स्वामित्व को दर्शाते हुवे बिल्ली को कुछ बिस्किट देकर उससे खेलने लगा, और साथ ही मैंने एक रबर का बैंड (लड़कियों के बाल बांधने के लिए) जो मेरे उस समय हाथो में थी, उस बिल्ली के अगले पंजे पर खेल खेल में मजबूती से (डबल ट्रिपल कर) बांध दिया, फिर दादा जी के आने के बाद बिल्ली स्वाभाविक रूप से चली गई।

दूसरे दिन बिल्ली नही आई, तीसरे दिन भी वो नही आई अब दादा जी कुछ चिंतित दिखे उन्होंने मुझसे भी प्रश्नात्मक तरीक़े से पूछा पर मैंने भी सिर हिला कर कह दिया कि वो लगभग तीन चार दिन से नही दिखी, लेकिन उस समय तक मुझे अपनी की गई छोटी सी गलती (बिल्ली के पंजे पर रबर का बांधना) लेश मात्र भी एहसास नही था, तकरीबन 4 या 5 दिन बाद बिल्ली सुबह सुबह लंगड़ाते हुवे दादा जी के खिड़की से प्रवेश की, मेरी नज़र उस बिल्ली पर देखते ही दिल दोहरी डर से जोड़ से धड़कने लगा, पहली डर बिल्ली की तकलीफ़ और दूसरी मेरी की हुई ग़लती के कारण, बिल्ली का पंजा जो बुरी तरह से फूल कर सूज चुका था, उसके पंजे के ऊपर के रोये झर गए थे,और रबर फुले हुए पंजे में कही दबा हुआ था जो कि आसानी से नही समझ में आ रही थी। फ़िर मैंने अनजान बनकर झूठमुठ बिल्ली के पंजे इंस्पेक्शन करने के नाटक करने के बाद दादा जी को उस रबर बैंड की बात बताई और कहा कि लगता है कि किसी ने बदमाशी से उसे वो बैंड पहना दिया जो अब उस बिल्ली का काल बना हुवा था, उस अनजान अपराधी को कोसते हुए दादा जी और मैंने ने अपनी तरफ से प्राथमिक उपचार करने की असफल कोशिशें की लेकिन कुछ खाश फायदा नही हुआ। अब दादा जी को अपने काम पर जाना था, बिल्ली वापस चली गई, फ़िर वो कभी वापस नही आई..!

मैं कई दिनों तक अपराध बोध से ग्रसित था कि बिल्ली शायद मेरी ग़लती की वजह से मर गई...मैंने इस बात को अपने भाई बहनों के साथ भी साझा नही किया, क्योंकि मुझे डर था कि बात अभिभावकों तक पहुँच सकती है, साथ ही मैंने दादी के मुख से कई बार सुना था कि बिल्ली को मारने वालो को दान में सोने की बिल्ली देनी पड़ती है। मुझे इस बात का डर था कि मेरी अपराध स्वीकृति से मेरे परिवार वालो को और एक मुसीबत यानी आर्थिक रूप से कमज़ोर कर सकती है, जिसका सारा जिम्मा मेरे सर पर आएगी, मैंने अपने जीवन मे कभी ये बात किसी से सांझा नही की, बचपन में तो डर कारण था फ़िर जवानी मे ये बात किसी से कहने योग्य नही (नगण्य) लगी । आज जब मैं इस वाक्या को लिख रहा हूँ तो मुझे इस बात का वाकई दुख हो रहा है  कि, काश मैं उस बिल्ली के लिए कुछ बेहतर उपचार कर सकता..!

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